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नीति के दोहे मुक्तक

                
                                                         
                            जनतंत्र राजहि नेता ,वन राजहि वनराज।
                                                                 
                            
दोनों गरजें राज में ,करते अपना राज।।

अपने को हानि न कोय , मन में करो विचार।
किसी के बहकावे में, मत बनिये हथियार।।

कवि : अशर्फी लाल मिश्र , अकबरपुर ,कानपुर।


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6 वर्ष पहले

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