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भार्गव राम खण्डकाव्य

                
                                                         
                            बत्तीस योजन दूरी थी,
                                                                 
                            
साकेत से जनकपुरी।
चार दिवस वरयात्रा में,
वरात पहुँची जनकपुरी।।

ढोल नगाड़ों की ध्वनि गूँजी,
खुशी फैल गई सिगरी नगरी।
हर कोई था अति आल्हादित,
आ गई वरात मिथिला नगरी।।

जगह जगह थे तोरण द्वार,
अरु सजे थे भव्य बन्दनवार।
मिथिलापति भी जा पहुँचे,
मिथिला नगरी मुख्य द्वार।।

आगे आगे था बज रहा बैंड,
घुड़सवार गज थे अनुगामी।
सिर सोहे केसरिया पगड़ी,
हाथ जिनके साकेत निसान।।

अनुगामी रथ पर राजा दशरथ,
कुल गुरु वशिष्ठ थे बैठे साथ।
विदेह हाथ में थी स्वागत माला,
प्रथम कीन्ही अर्पित गुरु माला।।
लेखक : अशर्फी लाल मिश्र, अकबरपुर, कानपुर।©
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