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जहां राग बना अनुराग

                
                                                         
                            वड़नगर की माटी पावन,
                                                                 
                            
गूंजे नाद ब्रह्म की वाणी।
शर्मिष्ठा का सुंदर तट है,
जहाँ बहे सुरों की पानी।
हाटकेश्वर की पूजा करके,
राग छेड़तीं दो बाला।
देख रूप सौंदर्य अनूठा,
झुके गगन का हर हाला॥१॥

कोमल स्वर जब मुख से निकले,
डोलें कलियाँ मुसकाकर।
बहती मंद सुगंधित बयार,
झूमे उपवन सब गाकर।
जल भरने की सुंदर बेला,
लय में बंधती हर धारा।
ऐसी कला-साधना जग में,
देखे सकल भुवन सारा॥2॥

दिल्ली के दरबार बीच में,
उठा ईर्ष्या का तूफान।
राग दीपक की ज्वाला सुलगै,
तड़पे संगीतज्ञ तानसेन प्रान।
अंग-अंग में दाह उठी है,
सूखा कंठ, बुझे दीप सारे।
भटके वन-उपवन दुखियारे,
मिले न कोई जीवन-तारे॥३॥

घट भरतीं दो भोली कन्या,
छलके पानी की हर बूंद।
सुर में सुर मिल ऐसे गाएँ,
खुले स्वर्ग के सारे कूँद।
पहुँचे तानसेन व्याकुल हो,
गिर चरणों में शीश झुकाया।
बोले हे देवियों रक्षा करो,
इस जग ने मुझको ठुकराया॥४॥

दयामयी वे दोनों बहनें,
मंदिर आँगन में आईं।
ध्यान लगाया महादेव का,
मल्हार-धुन मधुरी गाई।
निषाद-धैवत के स्वर गूंजे,
छिड़ा गगन में संगीत महान।
सुनी पुकार विधाता ने तब,
दौड़े आए बदरा अनजान॥५॥

घिरे घटा घनघोर गगन में,
चमकै बिजली चहुँओर।
नाच उठे मत्त होकर उपवन,
कूक उठे पपीहा और मोर।
झर-झर बरसे अमृत वर्षा,
तप्त देह शीतल हो आई।
जीवनदान मिला तानसेन को,
खुशियाँ जग भर में छाईं॥६॥

सुन यश गाथा सम्राट अकबर,
मन में अति हुलसाया।
शाही पालकी और घोड़ों का,
दल गुजरात भिजवाया।
आदेश सुनाया दिल्ली चलो,
दरबार की शोभा बनो री।
राजमुकुट के वैभव आगे,
झुकाओ सुरों की डोरी री॥७॥

मर्यादा की पावन मूरत,
रुकी सोच में दो बाला।
नारी गरिमा और कुल मर्यादा,
नहीं बिके राज का हाला।
कला उपासक कभी न झुकते,
धन के भूखे मनवाले।
अपने प्राण न्यौछावर कर दें,
स्वाभिमान के रखवाले॥८॥

राजभवन की दासता तज,
अग्नि-कुण्ड सजाया री।
हाटकेश्वर का नाम जप,
स्वयं को होम कराया री।
भस्म हुई भौतिक काया पर,
अमर हुआ यश का तारा।
अहमदशाह के महलों आगे,
जीत गया त्याग हमारा॥९॥

आज भी गूंजे वड़नगर में,
ताना-रीरी की मल्हार।
राग-त्याग की इस गाथा पर,
नत-मुख होता है संसार।
स्वर साधना जब सच्ची हो,
इतिहास नया रच जाती है।
अमर प्रेम और बलिदान की,
ज्योति सदा जगमगाती है॥१०॥

"स्वर की साधना जहाँ प्रकृति को झुका दे, और चरित्र की दृढ़ता जहाँ इतिहास रच दे—वही ताना-रीरी है।"
-अखिलेश जोशी ‘अनपढ़’
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8 घंटे पहले

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