राखी,
जब तुम मेरे जीवन में दुल्हन बनकर आईं
अनलिखे गीत को शब्द की माया बतलाई,
जीवन की सूनी देहरी पर दीपक की पावन ज्योत जगाई,
और जीवन को नव पथ की डगर अर्थ संग दिखलाई।
केवल मेरा हाथ नहीं थामा,मेरी नियति में दो उजले अध्यायो को भी जोड़ा,
चुन्नू और मुन्नू,जिन्होंने मुझे पापा श्रवण सुख से भी जोङा
सिर्फ तुम्हारा पति नहीं,बल्कि पिता होने का सौभाग्य दिया कुछ ऐसा।
उनकी आँखों में जब अपना प्रतिबिंब देखता हूँ,
तो तुम्हारा अंश दिखाई देता है;उनकी मुस्कान में
तुम्हारी ममता की उजास,और उनकी हर किलकारी में
हमारे प्रेम की प्रतिध्वनि सुनाई देती है।
तुम्हारे साथ बिताए वर्ष केवल समय नहीं हैं,
वे मेरी स्मृतियों की वह पांडुलिपि हैं
जिसका हर पृष्ठ तुम्हारे नाम से ही आरंभ होता ।
उस पांडुलिपि की स्हाई कागज और जिल्द तुम हो
जीवन ने कभी धूप के कठोर दिन दिए,
कभी संध्या की उदासी,कभी अनकहे प्रश्न भी आए—
मेरे भीतर तुम्हारे लिए प्रेम की नदी कभी शुष्क नहीं रही।
मैं केवल तुम्हारी मुस्कान को ही नहीं चाहता,
तुम्हारी खामोशियों में भी चुप कर सुनता हूँ;
तुम्हारी प्रसन्नता ही नहीं,तुम्हारी थकान को भी
अपना समझता हूँ।
राखी,
यदि जीवन एक कविता है,
तो तुम उसका सबसे सुंदर छंद हो;
यदि परिवार एक वृक्ष है,तो तुम उसकी वह जड़ हो
चुन्नू-मुन्नू की हँसी और मेरे जीवन की हरियाली
सींचीं है।
मुझे संसार से बहुत कुछ नहीं चाहिए—
बस इतना कि समय की अंतिम साँझ तक
जब पीछे मुड़कर देखूँ, तो तुम साथ खड़ी मिलो,
और मेरे जीवन की कविता का अंतिम शब्द भी
बस तुम्हारे नाम के प्रेम रस से दिल से लिखा हो।
राखी,
तुम मेरी पत्नी भर नहीं,मेरे जीवन की वह अनुभूति हो
शब्दों में बाँधना संभव नहीं; तुम ऐसी संगीत बनी रही हो
तुम्हें प्रेम करना मेरे लिए कोई वादा नही भगवत शब्द बना है,
मेरी जीवन-यात्रा का ये ही सबसे स्वाभाविक सत्य है।
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