ज़माने के फेरे में न आना तुम अपनी कहना
लोग छूट जाए तुम्हारे कहने से तुम अपनी कहना
सूरज की रोशनी डूब जाती है मन के अंधेरे में
ऐसे अंधेरे में न रहना तुम अपनी कहना
बड़े कशमकश के बाद मिलती है एक जिंदगी
इतने में ही भ्रम न रखना तुम अपनी कहना
किसी के कहने पर क़त्ल न करना तुम अपनी कहना
हाथ खाली रखना मगर दुआ न करना तुम अपनी कहना
तेज चुभते है वही कांटे जिन पर फूल नहीं होता
ऐसे फूलों से दोस्ती न रखना तुम अपनी कहना
थोड़ी जिंदगी अपने लिए भी बचा लेना
कब तक दूसरों के लिए जीना तुम अपनी कहना
जो दिल को तोड़ दे ऐसे ग़म न सहना तुम अपनी कहना
उखाड़ दे जो परिंदों के पंख उनसे उड़ान की बातें न करना तुम अपनी कहना
लोग कल भी थे आज भी है परसों भी होंगे गौतम
जब तक तुम रहना अपनी कहना
- ऐ. के. गौतम
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