क्या बात होती
वो मेरे ज़हन में रोज आता है
क्या ये इश्क़ में काफ़ी नहीं
मैं भीड़ में ऐसे गुम हो जाता हूं
अपने आप से दूर हो जाता हूं
कभी खुद को खोज लूंगा मै
क्या कहूंगा कहा था मैं
लोग भी क्या है मिलना तो जानते है
मगर बिछड़ने का सबब नहीं मालूम
बात नहीं करते उनसे बात ये है
बात करते तो क्या बात होती
- ऐ. के. गौतम
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