खो गया है वो आंगन अब
गूंजती थी जहां किलकारियां तब
भर जाता था नानी का घर
साथ होते थे जब हम सब
बिछती थी खटिया आंगन में
साथ होते थे एक साथ सब
सारी दोपहर हम शोर मचाते
अपनी हरकतों से सबको सताते
फिर नानी करती गुस्सा हम पर
फिर भी दिखता था हमको प्यार उस पर
समय का पता ही न चलता था
कि कब सूरज ढलता था और निकलता था
रह गई हैं अब यादें बस
नहीं आयेंगे वो गुजरे पल
काश ला पाती उन पलों को दोबारा
और जी लेती फिर वो बचपन सारा।
- आकांक्षा सिंह
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