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उस पगली को नयन लड़ाना नहीं आता

                
                                                         
                            माना हमें प्यार जताना नहीं आता।
                                                                 
                            
तुम्हें भी अंदाज़ा लगाना नहीं आता।

बहाने ही से सही आ जाते थे बाहों में।
क्यूँ याद अब कोई बहाना नहीं आता।

उसे भूलने का मैं हुनर सीख न पाया।
उसे भी मेरी यादें भुलाना नहीं आता।

अब मोहब्बत परवान चढ़े तो चढ़े कैसे।
उस पगली को नयन लड़ाना नहीं आता।

कभी पढ़ लिया करते थे हम ये आँखें।
"नवल"क्यूँ फिर वो ज़माना नहीं आता।
- नवल किशोर "नवल"
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11 महीने पहले

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