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कविता: मनुष्य

                
                                                         
                            कविता: मनुष्य
                                                                 
                            

किसे कहूँ पशु,
उस वनचर को
जो भूख की अग्नि लिए
निर्वाक पगों से
वन-पथ पर चलता है।

या उसे
जो मनुष्य का मुख लेकर
किसी की आत्मा पर
अपने अधिकार की मुहर लगा देता है।

पशु तो
ऋतुओं की भाषा पढ़ता है,
पवन की दिशा पहचानता है,
भूख में भी
प्रकृति की मर्यादा में रहता है।

मनुष्य ही है
जो चेतना का दीप जलाकर
उसी प्रकाश में
कभी-कभी अपना अंधकार छिपा लेता है।

नारी
केवल देह नहीं,
वह एक स्पंदित आकाश है,
एक अनकहा गीत,
एक स्वतंत्र स्वप्न,
एक ऐसी आत्मा
जिसे पाने से पहले
समझना पड़ता है।

प्रेम में
स्पर्श भी प्रार्थना होता है,
और वासना में
वही स्पर्श
असह्य घाव बन जाता है।

काश,
मनुष्य कभी
अपने भीतर उतरता,
तो देखता
जिस अंधकार से वह
दूसरों को घायल करता है,
उसका जन्म
उसी के भीतर हुआ है।

एक क्षण का मौन,
एक क्षण का ध्यान,
यदि आत्मा तक पहुँच जाए,
तो शायद वासना
करुणा में ढल जाए,
अहंकार
विनय बन जाए,
और शक्ति
किसी निर्बल की ढाल बन जाए।

किसी की चीख
किसी मनुष्य की विजय नहीं,

वह तो
उस सभ्यता की राख है
जिसे हमने
मानवता का नाम दिया था।

इसलिए
पशु को दोष मत दो।

पशु प्रकृति में जीता है,
मनुष्य को चेतना में जीना है।

जिस दिन
किसी की आँख का आँसू
अपनी ही आँखों में उतर आएगा,
जिस दिन
पराई पीड़ा
अपनी हृदय-पीड़ा लगेगी,

शायद उसी दिन
मनुष्य
सिर्फ मनुष्य कहलाएगा नहीं,
मनुष्य होने का अर्थ भी समझेगा।

- डी के कनौजिया
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33 मिनट पहले

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