तेरी ज़ुल्फ़ों की छाँव में कुछ ऐसा सुकून मिला,
जैसे भटकते हुए दिल को कोई घर मिल गया।
तेरी आँखों में डूबा तो ये एहसास हुआ,
कोई ख़्वाब था मेरा, जो मुकम्मल मिल गया।
तेरी ख़ुशबू से महकती रही रातों की फ़िज़ा,
तेरा तसव्वुर हुआ और मौसम बदल गया।
तेरी आवाज़ में जाने कैसी कशिश थी,
कि मेरा हर एक शिकवा ख़ुद-ब-ख़ुद पिघल गया।
तेरे दीदार की हसरत में गुज़ारी जो शब,
चाँद निकला तो लगा तू भी कहीं मिल गया।
हमने माँगा न था दुनिया से कोई और करम,
तेरा एहसास मिला, और मुक़द्दर मिल गया।
अब न मंज़िल की तमन्ना, न सफ़र की कोई चाह,
तेरे क़दमों में जो ठहरा, वही मंज़िल मिल गया।
इश्क़ को हमने समझना तो बहुत चाहा मगर,
तेरा नाम आया ज़ुबाँ पर—हर फ़साना मिल गया।
- डी के कनौजिया
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