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बुढ़ापे का बचपन

                
                                                         
                            बुढ़ापे का बचपन
                                                                 
                            

अब उम्र से अपनी कहाँ कोई गिला है,
दिल आज भी बच्चा है, यही तो सिलसिला है।

सब उम्र गुज़ारी है ज़माने की ख़ुशी में,
अब दिल ने कहा, जो मुझे भाए, वही भला है।

अब शाम को बेवजह निकल जाने को जी है,
किसने कहा बूढ़े को कोई काम मिला है।

बारिश में ज़रा भीग के देखूँ तो ज़रा मैं,
बरसों से बदन पर जो तहज़ीब का गिला है।

जलेबी जो दिख जाए तो नीयत बदलूँ क्यों,
डॉक्टर का भी कहना है, मगर दिल का भी कहा है।

पुरखों की वो गलियाँ हैं, वो टूटी हुई चौखट,
वहाँ आज भी मेरा कोई बचपन पड़ा है।

दोस्तों को बुलाऊँ तो कोई बात न होगी,
अब कौन-सा दुनिया में कोई काम बड़ा है।

कुछ देर किसी अपने के क़रीब बैठना है,
बस इतना ही अब ज़िंदगी से मेरा गिला है।

पहले मुझे दुनिया की नज़र चाहिए थी बहुत,
अब अपनी ही नज़रों में सही होना भला है।

जो छूट गया, उसका मलाल अब भी है लेकिन,
जो बच गया है, उसको ही जी लेना दुआ है।

मैं उम्र की दीवार से बाहर निकल आया,
अंदर कोई बच्चा अभी ज़िंदा खड़ा है।

अब मौत की बातें भी डराती नहीं मुझको,
जीने का अभी दिल में बहुत कुछ बचा है।

कह दो मुझे बूढ़ा न कहो, ऐ मेरे हमदम,
मैं आज भी भीतर से वही बच्चा रहा है।
- डी. के. कनौजिया
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
30 minutes ago

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