आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

'माँ की आंखों में ठहरा विरह'

                
                                                         
                            माँ तो माँ है,माँ होती है,
                                                                 
                            
बच्चों के सुख-चैन की खातिर,
न जाने क्या-क्या खोती है।
माँ तो माँ है, माँ होती है...

नहीं चाहेगी दूर रखे माँ,
अपने जिगर के टुकड़े को,
बच्चों के कर्तव्य के आगे अक्सर,
माँ की ममता विवश होती है।
माँ तो माँ है,माँ होती है ...

बच्चों की खुशियों की खातिर,
होठों पर मुस्कान सजाकर,
माँ छुप-छुपकर रोती है।
माँ तो माँ है, माँ होती है…
— कुमार आदित्य यदुवंशी 
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
3 घंटे पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर