नफ़रत जितनी बाँट सके तुम, उससे ज्यादा हम प्यार करेंगे,
टूटे मन के घावों पर हम, बनकर मरहम वार करेंगे।
एक-दूसरे के दुख में अपने, सुख का अंश लगाना होगा,
भारत को केवल कहना नहीं, भारत बनकर दिखाना होगा।
जब तक इस धरती पर साँसें, तब तक यही पुकार रहे,
हर दिल में इंसानियत हो और, हर दिल में प्यार रहे।
आने वाली पीढ़ी को सुंदर, भारत देश थमाना होगा,
अपने हिस्से का दीप जलाकर, सूरज नया उगाना होगा।
मंदिर की घंटी गूँजे तो, मस्जिद की अज़ान भी हो,
हर पूजा में प्रेम मिले और, हर दिल में सम्मान भी हो।
नफ़रत की भाषा छोड़कर, प्रेम का गीत सुनाना होगा,
बिखरे हुए हिंदुस्तान को, फिर से गले लगाना होगा।
भारत को केवल कहना नहीं, भारत बनकर दिखाना होगा।
मिट्टी की सौंधी खुशबू को, साँसों में फिर बसाना होगा,
टूटे हुए हर रिश्ते को, प्रेम से फिर सजाना होगा।
नफ़रत के अँधियारों में, प्रेम-दीप नया जलाना होगा,
इस धरती का मान बढ़ाने, मिलकर कदम बढ़ाना होगा।
भारत को केवल कहना नहीं, भारत बनकर दिखाना होगा।
जो खेतों में पसीना बहाए, उसका मान बढ़ाना होगा,
जो सीमा पर शीश चढ़ाए, उसको शीश झुकाना होगा।
मेहनत की हर बूँद से अपना, भारत नया बनाना होगा,
हर हाथों को काम मिले, ऐसा देश बनाना होगा।
भारत को केवल कहना नहीं, भारत बनकर दिखाना होगा।
-आदित्य कश्यप
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