उससे भी कुछ कहना सके,
मन के भी हम रहना सके,
जीवन रहा असमंजस में,
खुलकर कभी कुछ कह न सके।।
स्वप्न सुनहरा देखा था,
कि अपनी एक सहेली होगी।
उसको जानना और समझना,
जीवन की एक पहेली होगी।।
मेरी दूरी उससे ज्यादा,
उसकी मुझसे भी ज्यादा है।
उससे कहना कुछ है, बाकी,
शुरू नहीं कुछ आधा है।।
मेरे मन की गति मैं जानूँ,
वो कैसे जाने क्या बाधा है,
वो अलग विषय की जानकार,
मैंने अलग विषय को साधा है।।
वो नयन मूंद कर सोयी हैं,
मीठे स्वप्नों में खोयी है,
मैं जाग रात उसे लिखता हूँ,
नहीं हुई बात को लिखता हूँ।।
गूंज गूंज कर हृदय कहे,
मुख कुछ कहने से डरता है।
आगे आते उन्हें देखे आंखें,
पग चलते चलते थमता हैं।।
वो नयन उठा भले ना देखे,
हम झुकें नयन उन्हें देख रहें,
शब्दों ध्वनियों से कुछ न कहें,
पर मन ही मन हम कुछ तो कहें।।
उनके माथे की सूक्ष्म बिन्दु,
मेरे लिए है शरद इन्दु।
उनकी पल भर की यादों में,
लहरा रहा मेरा हृदय सिन्धु।।
जितनी गहरी उन्हें नींद लगी,
उतनी गहरी मैं पंक्ति लिखूं।
कवि कल्पना का मूल लिखूं,
उन्हें कल्पना का एक फूल लिखूं।।
उनका क्या रूप निखार लिखूं,
प्रकृति का क्या श्रृंगार लिखूं।
अग्नि कि आभा तेज लिखूं,
पानी-सी जीवनधार लिखूं।
भूमि का धीरज मान लिखूं,
पवन सी पावन प्राण लिखूं,
गगन सा उच्च विचार लिखूं,
ये उनका गुण श्रृंगार लिखूं।।
नहीं कही है मिथ्या भाष,
ये मेरे हृदय का प्रेमाभाष।
उन तक नहीं पहुंची मेरी बात,
तभी हृदय करेगा उनसे बात।
बादली वृक्षो से मिले न मिले,
पर जल कण तो बरसाएगी।
संवाद का अवसर मिले न मिले,
पर नयन सम्मुख तो आएगी।
स्वाति नक्षत्र के आने पर,
पपीहा भी प्यास बुझाता है।
सही समय के आने पर,
लगन पत्र बन जाता है।।
-आदित्य दाहिया
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