आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

कहना तो बहुत कुछ है तुझसे

                
                                                         
                            कहना तो बहुत कुछ है तुझसे,
                                                                 
                            
कहना तो बहुत कुछ है तुझसे,
मगर कह कहाँ पाता हूँ,
सच है कि जीना है अब तेरे बग़ैर,
मगर एक पल भी रह नहीं पाता हूँ ।

एक कोशिश रोज़ होती है तुझे भुलाने की,
मगर एक पल भी भुला कहाँ पाता हूँ,
देखता तो हूँ ख़्वाब हर रात,
मगर ख़ुद को सुला नहीं पाता हूँ ।

लिये फिरता हूँ एक समन्दर इन आँखों में,
मगर रो लूँ जी भर ऐसा कहाँ कर पाता हूँ,
जीना ही मुमकिन कहाँ था तेरे बग़ैर,
मगर मज़बूर हूँ, मर भी नहीं पाता हूँ ।

तू अगर देख पाती तो समझ जाती,
कि इस बेबसी को छुपा कहाँ पाता हूँ,
छलक जाता है दर्द कभी अल्फाज़ों से भी,
मगर मैं ख़ामोश भी रह नहीं पाता हूँ ।

अदित्य मिश्रा
 
- हमें विश्वास है कि हमारे पाठक स्वरचित रचनाएं ही इस कॉलम के तहत प्रकाशित होने के लिए भेजते हैं। हमारे इस सम्मानित पाठक का भी दावा है कि यह रचना स्वरचित है। आपकी रचनात्मकता को अमर उजाला काव्य देगा नया मुक़ाम, रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
5 वर्ष पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर