बद-दिली से भी यहाँ पेट भरे जायेंगे
लोग हालत पे तरस खा के चले जायेंगे
ये न सोचा था कि पेड़ों सा हरा दिल रख कर
चंद पैसों के लिए काट दिये जायेंगे
ख़्वाब ये ग़ैर-मुकम्मल न अगर रह जाता
मुमकिना यूँ न था वो कुछ भी कहे जायेंगे
मेरी हालत का नज़ारा भी निराला दुख है
मौत हर ख़्वाब में है फिर भी जिये जायेंगे
यूँ जुनूँ-ख़ेज़ तरीक़ा न लगा ग़ज़लों में
ख़ुद को बर्बाद यूँ कर शेर लिखे जायेंगे
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