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उम्मीद का अंकुर

                
                                                         
                            करुणा की भावना से भरकर तुम जाप करते रहे,
                                                                 
                            
ना जाने कितने ही लोगों का तुम भला करते रहे।

पर अफ़सोस!
खुद का कभी भला ना कर पाए तुम,
दूसरों की सूनी ज़िंदगी में कल्याण का रंग भरते रहे।

जब विश्वास की सबसे कठिन घड़ी आई,
तब क्या तुमने खुद को ही सबसे दूर कर लिया?

जीवन के हर एक रंगमंच से,
हर एक मोड़ से,
क्या तुमने अपने आप को चुपचाप अलग कर लिया?

हताश हुआ जब यह विवश मन,
तो बिखर कर धूल की तरह उड़ गया।

पर देखो!
तुम्हारे आँसुओं से जो उम्मीद का अंकुर निकला,
वह आज भी किसी और के मंगल का जाप करने लगा।
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
4 घंटे पहले

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