मूसलाधार वर्षा! ये सिर्फ वर्षा तो नहीं लगती,
ये जो गरज है, हां, इतनी भयानक गरज है,
यूं ही कैसे बरस रही है बिना थमे?
न जाने कितने ख़्वाबों की रातों में,
तुमने गरज-गरज कर मुझसे यही कहा है।
इतना पानी ना गिराओ इन बूंदों,
छत कमज़ोर है हमारी,
कहीं ये बादल का पानी,
सीधे हमारे सर पे ही न गिर जाए।
क्या कहूं और क्या ना कहूं,
इन अनजान राहों में...
तुम मूसलाधार हो,
हां तुम मूसलाधार हो!
महज़ एक ऋतु थोड़ी है,
ये तो साक्षात वर्षा का मौसम है।
जब बादलों के ठीक बीचों-बीच से निकलकर,
तुम अपना असली रूप निखारती हो,
न जाने कितने चमकदार किरणों से गुज़रकर,
तुम इस पावन धरती पर उतरती हो।
आकाश से धरा पर तुम्हारा ये आना,
यूं ही है जैसे कोई अपनी ही धुन में मग्न हो,
वैसे ही तुम उतरती चली आती हो।
ये मूसलाधार नहीं तो फिर क्या है?
तुम मूसलाधार वर्षा हो,
तुम मूसलाधार वर्षा हो!
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