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बंज़ारे की बेचैनी

                
                                                         
                            मैं बंज़ारा बन फिरता हूँ,
                                                                 
                            
अपनी हस्ती की राहों में,
जाने कैसी है ये बेचैनी,
जो सिमट गई मेरी बाहों में।

बदला था जिन उम्मीदों को,
मैंने अपनी ही आशा से,
अब खुद से बिछड़ कर रोता हूँ,
टूट कर इस निराशा से।

आँखें नम हैं,
ग़म भारी है,
इसकी क्या परिभाषा दूँ,
इस बेताबी के आलम को,
मैं क्या नया कोई नाम दूँ?

क्या हार मान लूँ रास्तों से,
क्या हौसला अपना खो दूँ मैं,
या बंद करूँ ये लिखना-गाना,
ख़ामोश अकेला हो दूँ मैं?

क्या तेरी ही मनमानी का,
अब गले में फंदा डालूँ मैं,
या रोज़ किसी पुरानी आदत सा,
तेरा ही नाम जपूँ मैं?

तुम ही कहो अब क्या करूँ,
किस मोड़ पे आकर ठहरूँ मैं?
- अभिषेक गुप्ता
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
36 मिनट पहले

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