पूर्वांचल से बहती हुई गंगा की धार,
ना जाने अतीत के कितने छोरों तक पहुँचकर,
मन को तृप्त करने की आशा जगाती है।
परंतु स्वार्थ में अंधा मनुष्य,
अपने निहित स्वार्थ के लिए दूसरों को निर्जीव कर देता है,
और इस तरह उसने पूर्वांचल के अस्तित्व को ही नष्ट कर दिया।
यह कैसा प्रतिनिधि का बँटवारा है?
जहाँ किसी निधि (संसाधन) का नहीं, बल्कि एक निर्धन का बँटवारा कर दिया!
जीवन के अभिशाप में बराबरी को छोड़,
सिर्फ अपनी बाहुबलता और उद्दंडता को ज्ञात किया।
अपने बाहुबल और दंड-शक्ति को शीर्ष पर पहुँचाने की माँग की,
यह समाज के हित के लिए अच्छा नहीं,
परंतु खुद को प्रसन्न करने के लिए अच्छा हो सकता है।
क्या सदैव खुद पर उँगलियाँ उठवाना ही,
इस प्रतिनिधि के बँटवारे का असली रूप है?
जीवन तो हर क्षेत्र से वैसे ही गुजर जाएगा,
जैसे हर घाट और अवसर पर आई हुई बौछार गुजर जाती है।
ना जाने कितने अंतहीन सवालों को लेकर तुम मौन हो गए,
और इस बँटवारे के अंतिम सवाल से, मन से विकलांग होते गए।
तुम खुद भूल गए कि जीवन की सच्ची दीक्षा और अभिलाषा क्या है!
जिसने अपने ही सृजन को, अपने ही परिजनों को,
इन अंतिम दुखों और सवालों से घेर दिया—
क्या तुम्हारी दया की यही माँग है?
या फिर यह व्यवस्था सजा के लिए उत्कृष्ट होगी?
क्या यह किसी को कष्ट देगी या न्याय करेगी?
तुम समझते होंगे कि यह प्रतिदिन का बँटवारा,
क्या जीवन के इन अंतिम सुलगते सवालों को खत्म कर देगा?
इस बिखरते आसमान को देखकर यह जमाना क्या समझेगा?
क्या यह हमारी साँसों को ही बुझा देगा?
ऐ जीवन की परिभाषा बदलने वाले... अब तुम ही जवाब दो!
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
कमेंट
कमेंट X