आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

दुल्हन

                
                                                         
                            बाग बड़ा अद्भुत है, फूलों के साथ शांत रहता है,
                                                                 
                            
इन कलियों से, तू चंचल क्यों है?
मत छिड़क पारा-मृग पाँव, किसके पास मुस्कुराऊँ,
बन जाऊँ किसके गले का हार।

चाँद भी दुबला है रातों में, हाथ की थपकी देकर कंपाता है,
मैं कहती हूँ सुनो, खिड़की पर पर्दा डाल दो प्रिय! वह झाँकती है मुझे।

हँस दो मोरे पिया, मोरे पिया, हँस दो मोरे पिया!
आँख बंद करके जब देखूँ प्रिय रे,
कहे झोंके की खामोशियाँ,
लौट आए ईश्वर की खामोशियाँ,
लौट आओ प्रिय रे मोरे पिया!
दूर क्षितिज पर रही पाठक,
काले बादलों से वह लम्हा आता है,
आँख बंद कर आज जब देखूँ प्रिय रे,
खुद भी खुद को न पहचानूँ।

पिया गाते रहें लोरी, कौन जीता, कौन हारा,
बातों में तुम कुछ कहते नहीं।
रहे लिपटे वैसे ही "प्रियतम के हाथ",
मुझको तुम छू लेते।
मुझको ऐसे छू लेते,
मोरे प्रिय, प्रिय मेरे प्रिय!
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
7 घंटे पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर