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बंज़ारा बनकर फिरता हूँ

                
                                                         
                            मैं अपनी ही हस्ती में बस बंज़ारा बनकर फिरता हूँ,
                                                                 
                            
क्या जाने क्यों इस आलम में,
मैं हर पल बेचैन रहता हूँ।

जो उमंगें बदली थीं मैंने,
अपनी ही इक नई आशा में,
अब खुद से बिछड़ कर रातों को,
मैं छुप-छुप कर रोता हूँ।

आँखें नम हैं,
इस ग़म की भला मैं क्या परिभाषा दे दूँ,
बस इतना पूछो मत मुझसे,
क्यों इतना बेज़ार रहता हूँ।

क्या टूट गया है हौसला मेरा,
क्या लिखना ही अब छोड़ दूँ मैं,
या तेरे दिए इस दर्द को ही,
अपनी तक़दीर कह दूँ मैं?

तेरी इस मनमानी का चलो,
अब हर एक शिकवा सह जाऊँ,
तुम ही बताओ ए हमदम,
मैं इस तन्हाई में किधर जाऊँ?
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एक घंटा पहले

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