आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

अहंकार की तोप

                
                                                         
                            तोप को ही बुलंद मानकर,
                                                                 
                            
तुमने उसे यूँ ही चला दिया,
क्या दूसरों को थोड़ा कष्ट देकर,
तुमने माहौल को अपने अनुकूल बना लिया?

खुद पर तो तुम दर्द का एक प्रहार भी न सह सके,
पर दूसरों के हँसते-खेलते जीवन को नष्ट कर दिया।

दूसरों को तड़पाकर,
अपनों से अलग करके,
तुमने खुद को भी इंसानियत से कोसों दूर कर दिया।

अब तुम ही बताओ...क्या मैं उस पीड़ित के मन के भाव कहूँ?
या फिर तुम्हारी इस क्रूर इच्छा की बात कहूँ?
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
4 घंटे पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर