मैं सोच रहा हूँ
कुछ कहूं
पर, कैसे
इस मतलबी संसार में
कौन सुनेगा
बात मेरी
सबको खलेगी
औकात मेरी।
कोई भी मुझसे
सहमत नहीं होगा
और कहेगा क्या-क्या, क्या...
इस मतलबी दुनिया को
या अमीर या किसी गरीब मुनिया को
क्या चाहिए -
बस, दोनों वक्त खाना
सुरक्षित परिवार
और कोई विवाद नहीं...
पर, जिस ख़ामोशी से
रोज-रोज अंकुश
लगा रहे हैं अपने आप पर
और समाज में हो रहे अन्याय
अनगिनत पाप पर,
एक दिन ऐसा आयेगा
सबकुछ धरा पे रह जायेगा
और हम निष्प्राण हो जायेंगे!
और तब स्वर्ग या नर्क से
दुनिया को देख पछतायेंगे
कि काश उस वक्त सच बोला होता
अपने ईमान को इन्सानियत के तराजू में तौला होता
तो धरती नर्क से बत्तर नहीं
बल्कि, काल्पनिक स्वर्ग से उत्तम होती
और समाज एवं लोगों के
विचारधाराएं अलग-अलग ना होकर एक होती
और सबसे ऊपर मानवता की स्थान
और कुछ नहीं...
स्वार्थ-ईर्ष्या, अपना-पराया का दूर-दूर तक कोई स्थान नहीं
फिर, समग्र भूमण्डल में एक परिवार
और एक ही जाति होती
परिवार मानवता का
और जाति इंसानियत की...
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