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हम मीना के सैलाब में मीलों बहते चले गए

                
                                                         
                            उनकी तवज्जो न मिली दिल को,
                                                                 
                            
बस अफ़साने बनते गए
राहों में बिछाया दिल पर
सिर्फ बहाने मिलते गए
करम उनके हम सिर्फ
हिसाब में गिनते रहे
और ज़ुल्म हम उनके
मुसलसल दफ़्न करते गए
तहरीर हमारी गोया एक
दास्तानें इश्क़ बन गई
उनकी मोहब्बत में बस
हम खोए चले गए
वो अपने न बन सके
हमारा दिल भी हुआ गुम
और हम मीना के सैलाब
में मीलों बहते चले गए
-अभय ‘अवधी’
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
22 घंटे पहले

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