बंदूके न थी सिर्फ बस्ते थे स्कूल के हाथों में
नफ़रत न थी सिर्फ ख़्वाब थे आँखों में
रियाज़ कर रहे थे वो अपने अपने हुनर का
वो मुजरिम न थे किसी के वो बच्चे थे किसी के
-अभय ‘अवधी’
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