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ग़ज़ल लिखूँ मैं

                
                                                         
                            छंद लिखूँ या ग़ज़ल लिखूँ मैं
                                                                 
                            
उसमें दिल की बात कहूँ मैं

मन के भीतर बहुत घट रहा
चुप रह कर भी चुप न दिखूं मैं

मैं निर्झर झरने की माफ़िक़
तेरे अंदर खूब बहूँ मैं

आने वाला मौसम कहता
फल मीठा सा कोई चखूँ मैं

मंज़िल मेरे पास है आती
चार क़दम जब कभी चलूँ मैं

साथ में मेरे हैं उजियारे
अँधियारों से अब न डरूँ मैं

ध्यान में “आभा” के खोता हूँ
जब जब उसकी ग़ज़ल पढ़ूँ मैं
-आभा सक्सेना दूनवी
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3 वर्ष पहले

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