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एकपलभी न ये रुकती हरगिज़

                
                                                         
                            वक़्त के साथ है चलती  दुनिया
                                                                 
                            
वक़्त के  साथ बदलती  दुनिया

साथ उसके नहीं चलता जो भी
साथ उसके नहीं चलती दुनिया

फिर तबाही  से कहाँ बच पाती
वक़्तपरगर न सम्भलती दुनिया

आज तकनीक न गर अपनाती
बल्लियोंफिर नउछलती दुनिया

एकपलभी न ये रुकती हरगिज़
रोज़ करवट  है बदलती दुनिया
-हमीद कानपुरी
 
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
एक घंटा पहले

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