ऐ भारत की संतान जागो, तुम्हें जगाने आई हूँ,
भारत में घटते अत्याचारों का सच बतलाने आई हूँ।
भारत का सिरमौर खतरे में, फिर भी आपस में बँटते हो,
ऐ वीर सपूतों जागो अब, तुम क्यों कर्त्तव्य से हटते हो?
भारत माता पुकार रही है, जागो सोए हुए जवान,
संकट की इस काली छाया में खोने मत दो स्वाभिमान।
देहली पर मुश्किल आ पहुँची, कैसा यह विनाश फैला,
मणिपुर धू-धू जलता रहा, असम का जल से आंचल मैला।
शिक्षा डूब गई पानी में, सत्ता आँख मूँद कर बैठी है,
रोज़ लीक होते हैं पर्चे, युवा-शक्ति भी ऐंठी है।
डिग्रियाँ हाथ में सिमटी हैं, पर रोज़गार का नाम नहीं,
मासूमों की आत्महत्याएँ, क्या शासन को कोई काम नहीं?
न्यायपालिका की आँखों पर अंधा पर्दा छा गया,
मीडिया भी अब बिक चुका, सच का सूरज ढल गया।
सच्चाई को दरकिनार कर, चाटुकारी का दौर चला,
जहाँ पूजी जाती थीं देवियाँ, वहाँ नारी का सम्मान ढला।
ना छोटी बच्ची सुरक्षित है, ना महिलाएँ निर्भय यहाँ,
किस मोड़ पे लाकर छोड़ दिया, तुमने अपना देश यहाँ?
कब तक सोओगे वीर जवानों, अब तो अपनी आँखें खोलो,
या फिर से गुलामी सहने को, खुद को तैयार कहोगे बोलो?
पहले तो हम गोरे अंग्रेज़ों के बंदी लाचार बने,
अब घटिया सोच और इस ज़ालिम सरकार के शिकार बने।
जागो वीर, उठो संतानों! भारत माता पुकार रही,
क्रांति की ज्वाला जलाओ अब, समय की धारा पुकार रही!
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