आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

चिड़ियों का रोना

                
                                                         
                            देख करके काल को 
                                                                 
                            
किलकारिया होने लगी 
पास खड़े उस सांप को 
चिड़िया जो रोने लगी 

घोसलो में थे कुछ बच्चे 
जिनके पर नहीं निकले थे 
उस बार भी इनके अंडोको 
इस सांप ने ही निगले थे 
चूँ चूँ चूँ की आवाज कर के 
अब तो खूब होने लगी 
देख करके उस काल को 
किल कारिया होने लगी 
पास खड़े उस सांप को 
चिड़िया जो रोने लगी 

असहाय हो करके खूब 
यूँ रट लगा रही थी 
आँखों से आंसुओ की 
खूब धारा बहा रही थी 
सांप को ले मोर उड़ गया 
तब तसल्ली होने लगी 
देख करके काल को 
किलकारिया होने लगी 
पास खड़े उस सांप को 
चिड़िया जो रोने लगी 

शम्भू नाथ कैलाशी


- हमें विश्वास है कि हमारे पाठक स्वरचित रचनाएं ही इस कॉलम के तहत प्रकाशित होने के लिए भेजते हैं। हमारे इस सम्मानित पाठक का भी दावा है कि यह रचना स्वरचित है। 

आपकी रचनात्मकता को अमर उजाला काव्य देगा नया मुक़ाम, रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें। 
6 वर्ष पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर