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दाग़ का नाम लो तो फ़लक से चांद हंसता है

साहित्य
                
                                                         
                            
रुहानियत ने चुना ग़ालिब को, दर्द मीर का हो गया
और शोख शरारतें  बोलीं, हम दाग़ पर फिदां हैं

नवाब मिर्जा खां दाग़ के बारे में ये कच्चा और अनगढ़ शेर मेरा है और इसे मैंने पूरे हक से लिखा है। हक इस तरह कि दाग़, मीर और ग़ालिब की तरह मेरा बचपन भी चांदनी चौक के आसपास की गलियों में बीता। ग़ालिब बल्लीमारां में थे और दाग़ लालकिले की चारदीवारी में। मैं नई सड़क के मालीवाड़ा मोहल्ले में अपने ननिहाल में था। फर्क सिर्फ वक्त का रहा। वे इन गलियों में मुझसे कोई दौ सौ साल पहले आए। वे भी खुदा के घर से पुरानी दिल्ली में उतरे और मैं भी। वे नामचीन शायर बनकर वापस गए। मैं एक गुमनाम अखबारनवीस हूं और जिंदा हूं। 

अखबारनवीस फितरत से मजमेबाज़ होते हैं। उनकी जान टीआरपी, सर्कुलेशन और पेज व्यूज में बसती है। पढ़ने-देखने वालों का ध्यान खींचने के लिए वे बातचीत का स्तर गिराने को तैयार रहते हैं। मैं भी इस आलेख का स्तर गिराते हुए एक दोयम दर्जे का सवाल सामने रखता हूं --- गालिब बड़े थे कि दाग़? 

सवाल यकीनन दोयम है। गुलदस्ते के फूलों की आपस में तुलना नहीं की जाती। गुलाब के फूल का अपना हुस्न है और जूही का अपना।  लेकिन मैंने एक बार नहीं, कई बार अदब की किताबों में पढ़ा और चौंका कि दाग़ की शायरी का एक अलग स्कूल है और बेशुमार चाहने वाले ग़ालिब को नहीं, दाग़ को इतिहास का सबसे बहुरंगी और बुलंद शायर मानते हैं। कई लेखों में ऐसे दावे भी पढ़े कि दाग़ दरअसल ग़ालिब से ज्यादा बाअसर शायर थे। 

अक्सर सोचता हूं कि बल्लीमारां का शायर ग़ालिब शोहरत में लालकिले के अहाते में पले दाग़ से आगे कब और कैसे निकल गया होगा ! क्या इसलिए कि ग़ालिब कोई तीन दशक पहले दुनिया में आ गए थे? या फिर ऐसा तो नहीं कि दाग़ को कुछ कम करके आंका गया और उनकी चर्चा कुछ कम हुई? ऐसा भी तो हो सकता है कि ग़ालिब का शोर आजाद हिंदुस्तान में ही ज्यादा  हो गया क्योंकि कुछ फिल्में और सीरियल बनने से ग़ालिब की मार्केटिंग उम्दा हो गई और दाग़ पिछड़ गए! या फिर ऐसा कि ग़ालिब के कलाम की पेचीदगी ही उनकी खासियत बनती चली गई क्योंकि जिसे समझना मुश्किल हो उसके लिए दिल में इज्जत और कौतूहल दोनों बढ़ जाते हैं! 

इससे किसे इनकार होगा कि ग़ालिब बेमिसाल हैं। इश्के हकीकी और इश्के मज़ाज़ी की जैसी गलबहियां उनके कलाम में दिखती है, वैसी और कहां? ग़ालिब शायरी के आसमान के सूरज हैं। लेकिन दिक्कत भी यही है। सूरज की तरह ग़ालिब की रोशनी भी किसी और को देखने लायक नहीं छोड़ती। सबका नूर उसके सामने फीका पड़ जाता है। 

लेकिन दाग़ देहलवी के कलाम की ताकत चांद की मानिंद है। शीतल और बादलों से अठखेलियां करता चांद। ग़ालिब के अशआर सूरज के ताप की तरह दुश्वार और मुश्किल होते हैं। दाग़ देहलवी का कलाम बेहद सादा जुबान है। गहरी गहरी बातें मगर बेहद आसान लफ्जों मेंः 

खातिर से या लिहाज से, मैं मान तो गया
झूठी कसम से आपका, ईमान तो गया


इस मुखड़े से शुरू होने वाली यह ग़ज़ल न जाने कितने नामचीन फनकारों ने गाई है। इसी का अगला मिसरा देखिए जो ख्याल की परवाज में दुनिया के किसी भी शायर का मुकाबला करता हैः 

हिस्रो हविसो ताबो तवां, दाग़ जा चुके
अब हम भी जाने वाले हैं, सामान तो गया....


महबूब से गुफ्तग़ू और शिकायतें ग़ालिब ने भी खूब की हैं, लेकिन ज़रा दाग़ के अंदाज पर नजर डालिएः 

उज़्र आने में भी है और बुलाते भी नहीं
बाएसे तर्के मुलाक़ात, बताते भी नहीं 

खूब पर्दा है कि चिलमन से लगे बैठे हैं
साफ छिपते भी नहीं, सामने आते भी नहीं 

देख के मुझको महफिल में ये इरशाद हुआ
कौन बैठा है इसे लोग उठाते भी नहीं 

ज़ीस्त से तंग हो दाग़ तो जीते क्युं हो
जान प्यारी भी नहीं जान से जाते भी नहीं 

 

गालिब के कलाम की तरह मुश्किल न थे दाग

ज़रा देखिए कि अयोध्याप्रसाद गोयलीय ने अपनी किताब शेर-ओ-शायरी में उस्ताद दाग़ के बारे में क्या लिखा हैः 

अहसन के शब्दों में  "दाग़ न सूफी थे न मुफ्ती। वे सिर्फ एक शाइर थे और शाइर भी ग़ज़ल के। और ग़ज़ल भी ऐसी कि जिसमें शोखी, शरारत, जली-कटी, ताने, रश्क, बदगुमानी, छेड़छाड़, लाग डांट, छीन झपट और उरियानी के सिवा कुछ नहीं।"

ज्ञानपीठ से प्रकाशित इसी किताब में मौलाना हामिद हुसैन कादरी का मूल्यांकन दिया गया है जिसमें वे फरमाते हैं कि, "दाग़ का शीरीं बयान और लुत्फ़ेज़बान ऐसा है कि इब्तदा से अब तक किसी शाइर को नसीब नहीं हुआ, जिद्दतेअदा इस कदर है कि वजुज ग़ालिब व मोमिन के कोई उनका हमपल्ले नहीं। शोखिए मजमून इतनी कि उनसे बढ़कर कहीं नज़र नहीं आती। ग़ज़ल की खूबी के लिए जरुरी है कि अल्फाज़ फ़सीह हों, बंदिश चुस्त और सही हो। मुहावरात का इस्तेमाल मौजूं व बरमहल हो। तर्जेअदा में जिद्दत हो। दाग़ के यहां ये सब चीजें बेहतर से बेहतर हैं और उन पर शोखबयानी और ज़राफत तराज़ी का इज़ाफ़ा है। यही दाग़ का तर्जेखास है। दाग़ का सबसे चमकता हुआ रंग शोखबयानी है।``

आगे बढ़ने से पहले दाग़ की इसी शोखी की कुछ फुटकर मिसालें देखेंः 

गश खाके दाग़ यार के कदमों पर गिर पड़ा
बेहोश ने भी काम किया होशियार का

हम बोसा लेके उनसे अजब चाल कर गए 
यूं बख्शवा लिया कि यह पहला कसूर था 

आता है मुझको याद सवाले विसाल पर 
कहना किसी का हाय, वोह मुंह फेरकर, `नहीं`

दिल का क्या हाल कहूं सुबह को जब उस बुत ने
लेके अंगड़ाई कहा, नाज़ से - हम जाते हैं 

जो तुम्हारी तरह तुमसे कोई झूठे वादे करता
तुम्हीं मुंसिफी से कह दो, तुम्हें एतबार होता? 

खुशी से कहते हैं, `यह भी मेरा ही आशिक था`
वह देखते हैं जिस नई मजार की सूरत 

रुखे रोशन के आगे शमअ़ रख वोह यह कहते हैं
`उधर जाता है देखें या इधर परवाना आता है?
`

ज़रा देखें कि जिंदगी के कितने रंग इस कलाम में हैं। यहां शायर हँस रहा है, चुहल कर रहा है, ताना मार रहा है। और यही शोखबयान शायर जब बेकसी और हिज्र के बयान पर आता है तो कितना संजीदा भी हो जाता है ----

ज़ीस्त से तंग हो दाग़ तो जीते क्युं हो
जान प्यारी भी नहीं जान से जाते भी नहीं...


ग़ालिब की ताकत मेरी नज़र में यह है कि उनमें सूफियाना रंग ज्यादा है। वे तबियत से फिलॉस्फर हैं। जिंदगी से ऊबे हुए। बल्कि जिंदगी को एक अभिशाप की तरह जीते हुए। याद है उनका शेर जिसका आशय कुछ ऐसा था

जब कुछ न था खुदा था, जो कुछ न होता तो खुदा होता,
मुझको मारा मेरे होने ने, जो न होता तो क्या होता... । 


याद ग़ालिब के उस शेर को भी कीजिए  'ये ना थी हमारी किस्मत कि विसाले यार होता... अगर और जीते रहते, यही इंतजार होता....।' और समाज से बेदिली की हद तक पहुंचने वाले ये अल्फाज़---- रहिए अब ऐसी जगह चलकर जहां कोई ना हो, हमसुखन कोई ना हो और हमजुबां  कोई ना हो....। जीवन ये यही ऊब गालिब़ के उस शेर में दिखती है जिसका आशय कुछ ऐसा था...

कब से हूं क्या कहूं ज़हाने खराब में 
शर्म आए ग़र रखूं हिज्र को भी हिसाब में...


दूसरी तरफ दाग़ हैं जिंदगी को इस कदर भरपूर तरीके से जीते हुए कि मौका मिलने पर खुदाई पर भी तंज कसने वाले। ज़रा गौर फरमाएंः 

मेरे क़ाबू में ना पहरों दिले नाशाद आया 
वो मेरा भूलने वाला जो मुझे याद आया
दी मुअज्जल ने अजां वस्ल की शब पिछले पहर 
हाय कंबख्त को किस वक्त, खुदा याद आया 


मिलन की रात के आखिरी पहर में महबूबों के बीच जब फूल खिल रहे होते हैं और इम्तहाईं लुत्फ़ के उन लम्हों में अगर मस्जिद से अजान की आवाज कानों में पड़ जाए तो उस्ताद दाग़ से पहले या बाद में कौन सा ऐसा शायर हुआ जो उस अहसास को इतने खिलंदड़ेपन से पेश कर देता? 

मैं दावा नहीं कर सकता कि मैंने दाग़ का पूरा रचनाकर्म पढ़ा है। ग़ालिब का भी नहीं। लेकिन जितना पढ़ा है, वह मुझे इस तुलना के लिए मजबूर कर देता है। मैं अक्सर इन दोनों हस्तियों का मिलान करता हूं और पाता हूं कि दाग़ के सामने चुनौती ज्यादा मुश्किल थी। ग़ालिब का जन्म सन् 1796 में हुआ और वे 1869 में दुनिया से विदा हुए। हज़रत दाग़ मई 1831 में जन्मे। इस तरह दाग़ की शायरी के परवान चढ़ने तक ग़ालिब अपना बेहतरीन काम कर चुके थे और दाग़ के सामने एक बहुत बड़ी लाइन पहले से मौजूद थी।

उस बड़ी लाइन से भी बड़ी लाइन खींचने और उस बेहतरीन से भी बेहतर कुछ करने की बेचैनी उन्हें अपने  शायरी के कॅरियर में सोने नहीं देती होगी। तो क्या ऐसा रहा होगा कि ग़ालिब के कलाम की पेचीदगी का मुकाबला उन्होंने अपने कलाम की सादगी से करने का फैसला किया होगा! क्या दाग़ ने अदब को फारसी की जटिलताओं से आजाद करने की जरुरत को सही वक्त पर समझ लिया था? अगर आला दर्जे की सोच को बड़े अवाम तक पहुंचाना किसी भी रचनाकार का कर्तव्य है तो क्या कला का यह लोकतंत्र दाग़ अपने सीनियर ग़ालिब से ज्यादा समझते थे? 
 
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गालिब के कलाम की तरह मुश्किल न थे दाग

4 वर्ष पहले

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