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आज का शब्द - वस्ल और फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ की ग़जल : मुझ से पहली सी मोहब्बत मेरे महबूब न माँग

Aaj ka Shabd Wasl
                
                                                         
                            अपने विचारों, भावनाओं और संवेदनाओं को व्यक्त  करने का सबसे सशक्त माध्यम मातृभाषा है। इसी के जरिये हम अपनी बात को सहजता और सुगमता से दूसरों तक पहुंचा पाते हैं। हिंदी की लोकप्रियता और पाठकों से उसके दिली रिश्तों को देखते हुए उसके प्रचार-प्रसार के लिए अमर उजाला ने 'हिंदी हैं हम' अभियान की शुरुआत की है। इस कड़ी में साहित्यकारों के लेखकीय अवदानों को अमर उजाला और अमर उजाला काव्य हिंदी हैं हम श्रृंखला के तहत पाठकों तक पहुंचाने का प्रयास कर रहा है। हिंदी हैं हम शब्द श्रृंखला में आज का शब्द है- वस्ल, जिसका अर्थ है- 1. मिलन; संगम 2. संयोग 3. संभोग 4. इंतकाल; मृत्यु। प्रस्तुत है फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ की ग़जल : मुझ से पहली सी मोहब्बत मेरे महबूब न माँग
                                                                 
                            

मुझसे पहली सी मुहब्बत मेरी महबूब न माँग

मैंने समझा था कि तू है तो दरख़्शाँ है हयात
तेरा ग़म है तो ग़मे-दहर का झगड़ा क्या है
तेरी सूरत से है आलम में बहारों को सबात
तेरी आँखों के सिवा दुनिया में रक्खा क्या है? 

तू जो मिल जाए तो तक़दीर निगूँ हो जाए
यूँ न था, मैंने फ़क़त चाहा था यूँ हो जाए
और भी दुख हैं ज़माने में मुहब्बत के सिवा
राहतें और भी हैं, वस्ल की राहत के सिवा
 
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5 वर्ष पहले

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