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आज का शब्द-ओट और अज्ञेय की कविता: मैंने आहुति बन कर देखा

आज का शब्द-ओट और अज्ञेय की कविता: मैंने आहुति बन कर देखा।
                
                                                         
                            अपने विचारों, भावनाओं और संवेदनाओं को व्यक्त करने का सबसे सशक्त माध्यम मातृभाषा है। इसी के जरिये हम अपनी बात को सहजता और सुगमता से दूसरों तक पहुंचा पाते हैं। हिंदी की लोकप्रियता और पाठकों से उसके दिली रिश्तों को देखते हुए उसके प्रचार-प्रसार के लिए अमर उजाला ने ‘हिंदी हैं हम’ अभियान की शुरुआत की है। इस कड़ी में साहित्यकारों के लेखकीय अवदानों को अमर उजाला और अमर उजाला काव्य हिंदी हैं हम श्रृंखला के तहत पाठकों तक पहुंचाने का प्रयास कर रहा है। हिंदी हैं हम शब्द श्रृंखला में आज का शब्द है-ओट जिसका अर्थ है-  1. छिपने की आड़; परदा 2. शरणस्थल; पनाहगाह। प्रस्तुत है अज्ञेय की कविता- मैंने आहुति बन कर देख...
                                                                 
                            

मैं कब कहता हूं जग मेरी दुर्धर गति के अनुकूल बने, 
मैं कब कहता हूं जीवन-मरू नंदन-कानन का फूल बने ? 
काँटा कठोर है, तीखा है, उसमें उसकी मर्यादा है, 
मैं कब कहता हूं वह घटकर प्रांतर का ओछा फूल बने ? 

मैं कब कहता हूं मुझे युद्ध में कहीं न तीखी चोट मिले ? 
मैं कब कहता हूं प्यार करूं तो मुझे प्राप्ति की #ओट मिले ? 
मैं कब कहता हूं विजय करूं मेरा ऊंचा प्रासाद बने ? 
या पात्र जगत की श्रद्धा की मेरी धुंधली-सी याद बने ? 
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5 वर्ष पहले

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