कटे अँगूठों की बंदनवारें बाँधे
सर-संधानों के जलसे मनाते तुम
बिके द्रोणाचार्यों के अभिजाती मूल्यों पर
दुर्घर महाभारत के थोथे गान गाते तुम
तब से आज तलक
स्वाभिमानी-सर्वहारा
चार अँगुलियों से ही
साधता अचूक लक्ष्य
आहत अस्तित्व का,
जीवित है जिजीविषा
सौ-सौ अभावों बीच
सदियों को रौंद-रौंद
रौरव की छाती पर
आस्था आदिवासियों की
अप्रतिहत अप्रगल्भ
सदियों के आर-पार
झूम रही निर्विकार
महुओं की मस्ती में
हल्की हरारत-सी
प्रस्फुटित होते ही
होती हराम नींद
हस्तिनापुरवासियों की
विस्मित अवाक्
मुँह बाए खड़े तकते सब
दुर्दम ज्वलंत
एकलवी चुनौतियाँ।
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