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Social Media Poetry: राहों में कितनी भटकन है क्या बतलाता मैं

वायरल काव्य
                
                                                         
                            राहों  में  कितनी  भटकन  है  क्या  बतलाता  मैं,
                                                                 
                            
दुनिया   टेढ़ी  चाल  मुसाफिर  सीधा  सादा  मैं,

अन्जानी  राहों   पर    सारे,
अन्जाने    से     ख़तरे    हैं,
मैंने  चिल्लाकर   देखा  है,
लोग  अधिकतर  बहरे  हैं,

कितने   संकेतों  से   बोलो   क्या  समझाता  मैं,
दुनिया   टेढ़ी  चाल  मुसाफिर  सीधा  सादा  मैं,

सारे   कच्चे   सम्बन्धों   के,
शिला-लेख  मिल  जाते हैं,
जितनी  दूर चला  आया हूँ,
कम  इतना  चल   पाते  हैं,

फिर भी लीक बना  कर अपनी  प्रीत निभाता मैं,
दुनिया  टेढ़ी   चाल  मुसाफिर  सीधा  सादा  मैं,

मैंने  भी सोचा था मन्जिल,
इतनी    दूर     नही   होगी,
चाहे  जितनी   दूर  रहे पर,
मुझसे   दूर    नही    होगी,

अवरोही   मीलों   के  पत्थर   पर   सुस्ताता  मैं,
दुनिया  टेढ़ी   चाल  मुसाफिर  सीधा  सादा  मैं। 

साभार: रत्नेश अवस्थी रत्न की फेसबुक वाल से 

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8 घंटे पहले

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