आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

Hindi Poetry: निर्मला पुतुल की कविता- क्या तुम जानते हो पुरुष से भिन्न एक स्त्री का एकांत?

कविता
                
                                                         
                            क्या तुम जानते हो 
                                                                 
                            
पुरुष से भिन्न 
एक स्त्री का एकांत? 

घर, प्रेम और जाति से अलग 
एक स्त्री को उसकी अपनी ज़मीन 
के बारे में बता सकते हो तुम? 

बता सकते हो 
सदियों से अपना घर तलाशती 
एक बेचैन स्त्री को 
उसके घर का पता? 

क्या तुम जानते हो 
अपनी कल्पना में 
किस तरह एक ही समय में 
स्वयं को स्थापित और निर्वासित 
करती है एक स्त्री? 

सपनों में भागती 
एक स्त्री का पीछा करते 
कभी देखा है तुमने उसे 
रिश्तों के कुरुक्षेत्र में 
अपने आपसे तड़ते? 

तन के भूगोल से परे 
एक स्त्री के 
मन की गाँठें खोल कर 
कभी पढ़ा है तुमने 
उसके भीतर का खौलता इतिहास? 

पढ़ा है कभी 
उसकी चुप्पी की दहलीज़ पर बैठ 
शब्दों की प्रतीक्षा में उसके चेहरे को? 

उसके अंदर वंशबीज बाते 
क्या तुमने कभी महसूसा है 
उसकी फैलती जड़ों को अपने भीतर? 
आगे पढ़ें

2 वर्ष पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर