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नहीं हलाहल शेष, तरल ज्वाला से अब प्याला भरती हूँ- महादेवी वर्मा

कविता
                
                                                         
                            नहीं हलाहल शेष, तरल ज्वाला से अब प्याला भरती हूँ। 
                                                                 
                            

विष तो मैंने पिया, सभी को व्यापी नीलकंठता मेरी; 
घेरे नीला ज्वार गगन को बाँधे भू को छाँह अँधेरी; 
सपने जमकर आज हो गए चलती-फिरती नील शिलाएँ, 

आज अमरता के पथ को मैं जलकर उजियाला करती हूँ। 

हिम से सीझा है यह दीपक आँसू से बाती है गीली; 
दिन से धनु की आज पड़ी है क्षितिज-शिञ्जिनी उतरी ढीली, 
तिमिर-कसौटी पर पैना कर चढ़ा रही मैं दृष्टि-अग्निशर, 

आभाजल में फूट बहे जो हर क्षण को छाला करती हूँ। 

पग में सौ आवर्त बाँधकर नाच रही घर-बाहर आँधी 
सब कहते हैं यह न थमेगी, गति इसकी न रहेगी बाँधी, 
अंगारों को गूँथ बिजलियों में, पहना दूँ इसको पायल, 

दिशि-दिशि को अर्गला प्रभञ्जल ही को रखवाला करती हूँ! 

नहीं हलाहल शेष, तरल ज्वाला से मैं प्याला भरती हूँ। 

2 वर्ष पहले

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