गिरि गह्वर की देह भिगोने
धरती का पद रज कण धोने
आंगन आंगन अमृत बोने
सतरंगी चूनर लहराई
मेरे गांव में बरसा आई।
खतम हुआ गर्मी का आतप
शीतल पवन झकोरे
गरज गरज घन गुरुतर घन से
तन विरहिन का तोरे
अकुलाया मन लगा डूबने
सुधियों की सरिता गहराई।
कातर नयनों से धरती
बादल की ओर निहारे
सिहर रहा है रोम रोम
रुक रुक कर बरसो प्यारे
शस्य श्यामला के यौवन पर
इतनी ठीक नहीं बरिआई।
पंख फुलाये गौरैया
दादुर की तान निराली
झूम झूम मल्हार गा रही
विटपों की हर डाली
हीरा मोती के माथे पर
हाथ फेरने लगा गोसाईं।
सारा दुख भूला किसान
रुख किया खेत की ओर
पथराई आंखों में उग
आई आशा की भोर
मिट्टी घुसने से घावों में
प्राण बेधने लगी बेवाई।
छप्पर छानी दाना पानी
बहा ले गई बाढ़
वेपनाह को अगहन जैसा
लगने लगा असाढ़
लाल रंग का पानी फैला
जैसे धोये हाथ कसाई।
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