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Jaun Elia Poetry: हो रहा हूँ मैं किस तरह बरबाद  देखने वाले हाथ मलते हैं

उर्दू अदब
                
                                                         
                            ठीक है ख़ुद को हम बदलते हैं 
                                                                 
                            
शुक्रिया मश्वरत का चलते हैं 

हो रहा हूँ मैं किस तरह बरबाद 
देखने वाले हाथ मलते हैं 

है वो जान अब हर एक महफ़िल की 
हम भी अब घर से कम निकलते हैं 

क्या तकल्लुफ़ करें ये कहने में 
जो भी ख़ुश है हम उस से जलते हैं 

है उसे दूर का सफ़र दर-पेश 
हम सँभाले नहीं सँभलते हैं  आगे पढ़ें

3 वर्ष पहले

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