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एकांत श्रीवास्तव- घूमती हुई पृथ्वी आज सामने आ गयी है नये साल की देहरी के

कविता
                
                                                         
                            जेठ की धूप में तपी हुई
                                                                 
                            
आषाढ़ की फुहारों में भीगकर
कार्तिक और अगहन के फूलों को पार करती हुई
यह घूमती हुई पृथ्वी
आज सामने आ गयी है
नये साल की देहरी के

तीन सौ पैंसठ जंगलों
तीन सौ पैंसठ नदियों
तीन सौ पैंसठ दुर्गम घाटियों को पार करने के बाद
आज यह घूमती हुई पृथ्वी

यह पृथ्वी
टहनी से टपका एक ताजा पका फल
लुढ़ककर आ गया है साबुत
अभी-अभी लिपे हुए आंगन में
प्रथम दिवस की चौखट के सामने
तीन सौ पैंसठ पत्थरों से बचकर

न जाने कितने लोगों का भय रेंग रहा है इस पर
न जाने कितने नगरों-गावों का रक्त
बह रहा है अभी भी
न जाने कितनी चीखों से
दहल गयी है यह पृथ्वी आगे पढ़ें

2 वर्ष पहले

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