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सरस्वती माथुर: गुनगुनी धूप में धुआँ-धुआँ-सी घूम रही है

कविता
                
                                                         
                            गुनगुनी धूप में
                                                                 
                            
धुआँ-धुआँ-सी
घूम रही है
मुखरित-सी पुरवाई
... नववर्ष के द्वारे देखो
मनभावन-सी
सर्दी आई

अलाव की लहरों पर
पिघलती कोहरे की परछाई
तितली-तितली मौसम पर
गीत सुनाती
शरद ऋतु की शहनाई
नववर्ष के द्वारे देखो
मनभावन-सी सर्दी आई आगे पढ़ें

2 वर्ष पहले

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