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धुआं-धुआं हो गया तेरी कायनात का मंजर : बिमल सहगल

कविता
                
                                                         
                            धुआं-धुआं हो गया तेरी कायनात का मंजर
                                                                 
                            
या खुदा, घोल दिया इसमें किसने यह ज़हर है?

आलूदगी की कैद में तड़पती हैं सांसे, बदहवास  
गर्दिश से शर्मसार, कहाँ छिपा बैठा आफताब है?

किधर जा खो गया वो ताजी हवाओं को छूना
गुलशन में उड़ती वो आवारा महक कहां है?

इनायत में बख्शी जिंदगी, क्यों बन गई है सज़ा
इस शैतानी तख़लीक़ में क्या तेरी भी रज़ा है?  

8 महीने पहले

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