बहुत सजा पायी है,
सच बोलने की,
खता बस इतनी है,
कि सच बोलने की आदत है।
बहुत सजा पायी........
ये सच है कि दुनिया ने हमें,
समझा कसूरवार,
पर आदमी तो हम ठीक़ठाक़ हैं।
बहुत सजा पायी........
चलो जो हुआ सो हुआ,
उषा से सांझ होने लगी,
छाया अब फैल रही है,
अंधेरा सबको आगोश में ले रहा है,
हमें फक्र है कि,
हम न झुके न हमने न बुरा किया,
और न ही अनाचार सहा।
बहुत सजा पायी......
यह सच है कि,
इसकी भरपूर कीमत चुकानी पड़ी,
पर मलाल नहीं है हमें,
क्योंकि जो सच था,
वही कहा वही सुना,
वही सबको सुनाया।
बहुत सजा पायी......
ऐसा क्यों किया रे इंसान,
जिन पंचतत्वों सें हुआ तुम्हारा निर्माण,
उन्हीं का करने लगे तुम विनाश,
परमेश्वर ने तुम्हें ही दी विवेक और बुद्धि,
करने को विश्व कल्याण,
मगर तुम करने लगे अत्याधिक दोहन,
कुंएं, पोखरों व नदियों को,
और करते हो उन्हें प्रदूषित।
ऐसा क्यों किया.......
हर जीव जन्तु का तुम कर रहे हो विनाश,
यहां तक कि सांप व चमगादड़ों तक को,
तुमने छोड़ा नहीं,
तुम्हीं बताओ जीवों की ऐसी कौन-सी
जाति-प्रजाति,
कि जिसको दिया हो तुमने अभयदान,
मानव तुम्हें हो गया है बड़ा अभिमान।
ऐसा क्यों किया.......
माना बना लिये तुमने एक से एक,
विध्वंसक हथियार और जलयान,
किन्तु प्रकृति हो गई है तुमसे रूष्ट,
कर दिया तुम पर वैश्विक प्रहार,
प्रकृति और मानव कल्याण से,
हो रहे हो तुम विरत,
हो जायेगा तुम्हारा सर्व नाश।
ऐसा क्यों किया.......
हम सनातनी भोजन करने के पहले,
ईश्वर को देते धन्यवाद,
और ईश्वर के सम्मान में निकालते हैं ग्रास,
गाय, कुकुर, चींटी, कौवे,
और पक्षियों का भी करते हैं सम्मान,
और उनके लिए भी अपने भोजन से,
निकालते हैं उनका भाग।
ऐसा क्यों किया.......
कदाचित् गर तुम चलते रहते,
सनातनी धर्म व मानवता के अनुसार,
तो आती ही नहीं यह स्थिति,
जिससे रूबरू हो तुम आजकल।
ऐसा क्यों किया.......
भारत, भारतीय संस्कार और संस्कृति,
ही करेगी इसका निदान और उपचार,
जनहित, प्रकृतिहित और सर्वहित का छेड़ो
अभियान,
अन्यथा हो जायेगी प्रलय,
और मिट जायेगा तुम्हारा नामोनिशान,
गर अब भी नहीं चेते,
तो निश्चित है मानव का विनाश।
ऐसा क्यों किया.......
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