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बंसल बेबाक की 2 कविताएं

कविता
                
                                                         
                            बहुत सजा पायी है,
                                                                 
                            
सच बोलने की,
खता बस इतनी है,
कि सच बोलने की आदत है।
बहुत सजा पायी........

ये सच है कि दुनिया ने हमें,
समझा कसूरवार,
पर आदमी तो हम ठीक़ठाक़ हैं।
बहुत सजा पायी........

चलो जो हुआ सो हुआ,
उषा से सांझ होने लगी,
छाया अब फैल रही है,
अंधेरा सबको आगोश में ले रहा है,
हमें फक्र है कि,
हम न झुके न हमने न बुरा किया,
और न ही अनाचार सहा।
बहुत सजा पायी......

यह सच है कि,
इसकी भरपूर कीमत चुकानी पड़ी,
पर मलाल नहीं है हमें,
क्योंकि जो सच था,
वही कहा वही सुना,
वही सबको सुनाया।
बहुत सजा पायी...... आगे पढ़ें

2 वर्ष पहले

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