अब नदियों में
पहाड़ चढ़ने का हौसला नहीं रहा
बुखार में तपती एक नदी
बर्फ़ में लिपटे एक सूरज को
अपनी आँखों में दर्ज़ कर रही है ।
और समय पत्थरों में क़ैद
स्तब्ध है ।
पत्तियों में अब
क़ैद नहीं रहा
वृक्षों का बचपन
मिट्टी वृक्षों का भार
ढोते-ढोते ऊब चुकी है ।
स्त्रियाँ अपने कंधों से
समय की गर्द
झाड़ रही है
उनके पैरों ने
सीख ली है
हवा की भाषा
अपने पैरों से वे
धरती पर उभार रही है
वर्णमालाएँ ।
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