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Koshala Literature Festival: "ऐसा लगता है जैसे हम वापस भीमबेटका केव पेंटिंग के दौर में वापस लौट आए हैं"

koshala literature festival anand neelakantan talks about era of visual storytelling
                
                                                         
                            

लखनऊ में चल रहे तीन-दिवसीय कौशल साहित्योत्सव का रविवार को आख़िरी दिन है। बाक़ी दोनों दिन की तरह इस दिन भी वक्ता और श्रोताओं का उत्साह बरक़रार था। इसी दिन एक सत्र में 'एरा ऑफ विजुअल स्टोरीटेलिंग' विषय पर लेखक आनंद नीलकंठन कहा कि हमारे यहां लंबी कहानियों की परंपरा रही है। कथकली से ही जो पेश किया जाता है, वह चार से सात दिन चलता है। यही वजह है धारावाहिकों में जो सीन चलते हैं, वे वर्षों चलाए जाते हैं। प्रेग्नेंसी के ही सीन तीन-तीन साल चलते हैं। उनकी इस बात पर दर्शक हंस पड़े। 

आगे उन्होंने कहा कि आज की तारीख़ में शब्द अप्रासंगिक हो गए हैं। कहानी कहने का तरीका बदल चुका है। महाभारत हो या रामायण पहले स्टोरी काव्य रूप में कही जाती थी। लेकिन अब मोबाइल ने सब बदलकर रख दिया है। शब्दों की जगह इमोजी ने ली है। ऐसा लगता है जैसे हम वापस भीमबेटका केव पेंटिंग के दौर में वापस लौट आए हैं, जहां कहानियां शब्दों नहीं, चित्रों के ज़रिये कही जाती थीं। साथ ही संवाद कर रहे प्रो. पुष्पेश पंत ने जब 'लैंग्वेज ऑफ विजुअल स्टोरीटेलिंग' के बारे में पूछा तो आनंद ने कहा, "अब इसके लिए लैंग्वेज और साक्षरता की बाध्यता खत्म हो गई है।" उन्होंने कहा कि "ओटीटी के लिए लिखना नॉवेल राइटिंग टाइप हो गया है।" 

3 वर्ष पहले

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