आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

एक सेंचुरी काफी नहीं: अब भी बची हुई थी रोशनी की किरण

ek century kaafi nahi book part
                
                                                         
                            
मेरे सारे विकल्प खत्म हो चुके थे और अब मैं ये सोच रहा था कि क्या इस अंधेरी रात की सुबह कभी होगी। घरेलू मोर्चे पर हालात काफी तनाव भरे थे। मेरी पत्नी  ने कुछ नहीं कहा, लेकिन उसके व्यवहार में निराशा साफ झलक रही थी। मैंने देखा कि ज्योतिषि भी मेरे घर आकर मां को सलाह दे रहे थे। उन्हें यकीन हो चला था कि कोई तागा या अंगूठी पहनना ही अब मेरी किस्मत बदलने का इकलौता तरीका बचा था। हालांकि मैं ऐसा नहीं मानता था।

मेरे पिता प्रोफेशनल मामलों में मुझसे कोई चर्चा नहीं करते थे। लेकिन एक शाम वह मेरे पास एक अखबार में छपी रिपोर्ट लेकर आए, जिसमें लिखा था कि वेस्ट इंडीज में हुई एक दिवसीय मैचों की सीरीज में टीम इंडिया की जीत के बाद मेरे लिए वापसी के रास्ते हमेशा के लिए खत्म हो गए थे। मैं बड़े लंबे अरसे के बाद बापी से क्रिकेट के मसलों पर चर्चा कर रहा था। ऐसा लगा जैसे कि हम फिर से उस दौर में वापस पहुंच गए, जब मैं चौदह साल का अनिश्चय और उत्सुकता से बरा लड़का था और वह मेरे मार्गदर्शक। उन्हें लगता था कि जितनी बार भारत की टीम कोई क्रिकेट मैच जीत रही थी, मेरी टीम में वापसी के आसार कम होते जा रहे थे। उन्होंने कहा, 'महाराज, तुमने काफी कुछ हासिल कर लिया है, तुम आखिर सम्मान के साथ अलविदा क्यों नहीं कह देते?' उनकी आवाज में चिंता और दुख था। इसने मुझे असहाय बना दिया। आखिरकार उन्होंने वह कहा, जिसे वे नहीं कहने की भरसक कोशिश कर रहे थे, उन्होंने कहा, 'महाराज, मेरा यकीन करो, मुझे अब कोई रास्ता तुम्हारे लिए नजर नहीं आता। दुखद बात ये है कि तुम्हारे लिए अब आशा की कोई किरण नहीं है।'

एक पिता और बेटे के बीच...

एक पिता और बेटे के बीच हो रहा ये बेहद भावुक संवाद था। मेरे पिता अब नहीं हैं, लेकिन मुझे अच्छी तरह याद है कि मैंने उनसे क्या कहा था। मैंने कहा कि कोई भी खिलाड़ी पूरी जिंदगी नहीं खेल सकता है। चाहे किसी को भी ले लीजिए, चाहे माराडोना हो, संप्रास या फिर गावस्कर, हर किसी को एक दिन रुकना पड़ता है। मुझे नहीं पता मुझे अभी रुकना है या फिर बाद में। लेकिन मैं इस ख्याल के साथ नहीं जीना चाहता कि मुश्किल हालात में मैंने कड़ी मेहनत नहीं की। मैंने एक फैसला किया कि मैं तब तक लड़ता रहूंगा, जब तक कि लड़ना नामुमकिन न हो जाए। हां ये जरूर है कि मेरे पास संन्यास लेने का एक आसान रास्ता है और इस तरह मैं अब तक बनाए गए करियर का आनंद ले सकता हूं। लेकिन मैं पूरी जिंदगी सोफे पर बैठकर ये सोचते हुए नहीं बिता सकता कि मैंने अपना सर्वोत्तम प्रयास नहीं किया। उस दिन मैं खुद अपनी नजरों से गिर जाऊंगा।

मेरे पिता मेरे हर कदम पर मेरे साथ जिंदगी भर खड़े रहे और उस दिन भी उन्होंने स्वीकृति में सिर हिला दिया। अंदर कहीं मुझे इस बात का अहसास था कि वह पूरी तरह मेरी बात से सहमत नहीं थे। बातचीत खत्म हुई और मैं अपने कमरे में आ गया। मैंने उस रात खुद से कहा, सौरव गांगुली, तुम खुद को एक साल और दो और देखो क्या होता है। उस रात मैंने तीन फैसले किए। पहला कि मैं कड़ी मेहनत करूंगा। दूसरा कि मैं इस साल रणजी मैचों में खेलूंगा। तीसरा कि मैं हार नहीं मानूंगा। उस समय तक मैंने एक निजी ट्रेनर रख लिया था। मैं हफ्ते में छह दिन उसके साथ कड़ी मेहनत करता था। इसमें पचास फीसदी ट्रेनिंग तो खुद को फिट करने की थी। बाकी पचास फीसदी अपने खुद के भीतर के गुस्से को निकालने की थी। मुझे इडेन गार्डन्स की एक शाम याद है, मैंने ग्राउंड के बीस चक्कर लगाए। आपको यकीन नहीं होगा कि आखिरी पांच या छह चक्कर तो मैं बस यंत्रवत दौड़ता जा रहा था। मैं अपने ख्यालों में इतना डूबा हुआ था कि मुझे खुद नहीं पता था कि मैं कितना दौड़ रहा था। इतनी कड़ी मेहनत का नतीजा यह हुआ कि बिना बल्ले को हाथ लगाए ही मैं लगभग नौ किलो वजन कम कर चुका था। यह एक सुखद आश्चर्य था। मेरा दिमाग तीन हिस्सों में बंट गया था। 
आगे पढ़ें

एक पिता और बेटे के बीच...

8 वर्ष पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर