मेरे सारे विकल्प खत्म हो चुके थे और अब मैं ये सोच रहा था कि क्या इस अंधेरी रात की सुबह कभी होगी। घरेलू मोर्चे पर हालात काफी तनाव भरे थे। मेरी पत्नी ने कुछ नहीं कहा, लेकिन उसके व्यवहार में निराशा साफ झलक रही थी। मैंने देखा कि ज्योतिषि भी मेरे घर आकर मां को सलाह दे रहे थे। उन्हें यकीन हो चला था कि कोई तागा या अंगूठी पहनना ही अब मेरी किस्मत बदलने का इकलौता तरीका बचा था। हालांकि मैं ऐसा नहीं मानता था।
मेरे पिता प्रोफेशनल मामलों में मुझसे कोई चर्चा नहीं करते थे। लेकिन एक शाम वह मेरे पास एक अखबार में छपी रिपोर्ट लेकर आए, जिसमें लिखा था कि वेस्ट इंडीज में हुई एक दिवसीय मैचों की सीरीज में टीम इंडिया की जीत के बाद मेरे लिए वापसी के रास्ते हमेशा के लिए खत्म हो गए थे। मैं बड़े लंबे अरसे के बाद बापी से क्रिकेट के मसलों पर चर्चा कर रहा था। ऐसा लगा जैसे कि हम फिर से उस दौर में वापस पहुंच गए, जब मैं चौदह साल का अनिश्चय और उत्सुकता से बरा लड़का था और वह मेरे मार्गदर्शक। उन्हें लगता था कि जितनी बार भारत की टीम कोई क्रिकेट मैच जीत रही थी, मेरी टीम में वापसी के आसार कम होते जा रहे थे। उन्होंने कहा, 'महाराज, तुमने काफी कुछ हासिल कर लिया है, तुम आखिर सम्मान के साथ अलविदा क्यों नहीं कह देते?' उनकी आवाज में चिंता और दुख था। इसने मुझे असहाय बना दिया। आखिरकार उन्होंने वह कहा, जिसे वे नहीं कहने की भरसक कोशिश कर रहे थे, उन्होंने कहा, 'महाराज, मेरा यकीन करो, मुझे अब कोई रास्ता तुम्हारे लिए नजर नहीं आता। दुखद बात ये है कि तुम्हारे लिए अब आशा की कोई किरण नहीं है।'
एक पिता और बेटे के बीच...
एक पिता और बेटे के बीच हो रहा ये बेहद भावुक संवाद था। मेरे पिता अब नहीं हैं, लेकिन मुझे अच्छी तरह याद है कि मैंने उनसे क्या कहा था। मैंने कहा कि कोई भी खिलाड़ी पूरी जिंदगी नहीं खेल सकता है। चाहे किसी को भी ले लीजिए, चाहे माराडोना हो, संप्रास या फिर गावस्कर, हर किसी को एक दिन रुकना पड़ता है। मुझे नहीं पता मुझे अभी रुकना है या फिर बाद में। लेकिन मैं इस ख्याल के साथ नहीं जीना चाहता कि मुश्किल हालात में मैंने कड़ी मेहनत नहीं की। मैंने एक फैसला किया कि मैं तब तक लड़ता रहूंगा, जब तक कि लड़ना नामुमकिन न हो जाए। हां ये जरूर है कि मेरे पास संन्यास लेने का एक आसान रास्ता है और इस तरह मैं अब तक बनाए गए करियर का आनंद ले सकता हूं। लेकिन मैं पूरी जिंदगी सोफे पर बैठकर ये सोचते हुए नहीं बिता सकता कि मैंने अपना सर्वोत्तम प्रयास नहीं किया। उस दिन मैं खुद अपनी नजरों से गिर जाऊंगा।
मेरे पिता मेरे हर कदम पर मेरे साथ जिंदगी भर खड़े रहे और उस दिन भी उन्होंने स्वीकृति में सिर हिला दिया। अंदर कहीं मुझे इस बात का अहसास था कि वह पूरी तरह मेरी बात से सहमत नहीं थे। बातचीत खत्म हुई और मैं अपने कमरे में आ गया। मैंने उस रात खुद से कहा, सौरव गांगुली, तुम खुद को एक साल और दो और देखो क्या होता है। उस रात मैंने तीन फैसले किए। पहला कि मैं कड़ी मेहनत करूंगा। दूसरा कि मैं इस साल रणजी मैचों में खेलूंगा। तीसरा कि मैं हार नहीं मानूंगा। उस समय तक मैंने एक निजी ट्रेनर रख लिया था। मैं हफ्ते में छह दिन उसके साथ कड़ी मेहनत करता था। इसमें पचास फीसदी ट्रेनिंग तो खुद को फिट करने की थी। बाकी पचास फीसदी अपने खुद के भीतर के गुस्से को निकालने की थी। मुझे इडेन गार्डन्स की एक शाम याद है, मैंने ग्राउंड के बीस चक्कर लगाए। आपको यकीन नहीं होगा कि आखिरी पांच या छह चक्कर तो मैं बस यंत्रवत दौड़ता जा रहा था। मैं अपने ख्यालों में इतना डूबा हुआ था कि मुझे खुद नहीं पता था कि मैं कितना दौड़ रहा था। इतनी कड़ी मेहनत का नतीजा यह हुआ कि बिना बल्ले को हाथ लगाए ही मैं लगभग नौ किलो वजन कम कर चुका था। यह एक सुखद आश्चर्य था। मेरा दिमाग तीन हिस्सों में बंट गया था।
पहले में मुझे खुद की क्षमता पर जबरदस्त विश्वास था। दूसरे में अपनी वापसी को लेकर मैं संशय में था, तीसरे में जैसा कि मेरे पिता ने कहा था, मैं टीम इंडिया की हर जीत के साथ निराशा से भरता जा रहा था। इसी बीच चैंपियंस ट्रॉफी शुरू हुई। इस बार भारत इसकी मेजबानी कर रहा था। यह एक ऐसा टूर्नामेंट था, जहां मौजूद भारतीय टीम के खिलाड़ियों के मुकाबले मेरा प्रदर्शन सबसे शानदार था। बावजूद इसके जैसा कि उम्मीद थी, फिर भी मेरा चयन नहीं हुआ। इस बार और दुख इसलिए भी हुआ, क्योंकि टूर्नामेंट मेरे ही क्षेत्र में खेला गया था। रणजी में भी मेरी गतिविधि बंगाल की टीम की कप्तानी तक ही सीमित रही। यह आसान नहीं था कि आप आधे भरे स्टेडियम में खेलंे, ऐसे होटलों में रुकें, जहां बहुत कम सुविधाएं हों और ऐसी टीमों के खिलाफ खेलें जो कि अंतरराष्ट्रीय स्तर से काफी नीचे हों।
ठीक इसी समय मुझे पेप्सी कंपनी के बॉस की तरफ से एक फोन आया और मुझसे एक ऐसे विज्ञापन के लिए कहा गया, जो मेरे संकटग्रस्त मौजूदा हालात के इर्द-गिर्द ही बुना गया था। उन्होंने मुझसे कहा कि आज तक किसी एक खिलाड़ी के बाहर होने पर जनता में इतना गुस्सा उन्होंने कभी नहीं देखा। पेप्सी ब्रांड मेरी मदद करने की नीयत से यह विज्ञापन जनता के बीच ले जाना चाहता था। मैंने मना कर दिया। मैं किसी ऐसे मेलोड्रामा का हिस्सा नहीं बनना चाहता था। न ही मैं किसी एक अभियान में शामिल होकर सहानुभूति हासिल करना चाहता था, जहां मुझे कहना पड़े कि 'मैं सौरव गांगुली हूं, भूले तो नहीं, जो हुआ क्यों हुआ? कैसे हुआ?' उस विज्ञापन के अंत में मुझे भारी मन के साथ कहना था, 'हवा में शॉट घुमाने के लिए एक मौका और मिल जाए?'
पेप्सी को मेरा इनकार अच्छा नहीं लगा। एक दिन मुझे एक लीगल नोटिस मिला, जिसमें कहा गया था कि पेप्सी के पास स्क्रिप्ट को लेकर फैसला करने का अधिकार है, जब तक कि वह एक ब्रांड के तौर पर मेरी इमेज को चोट नहीं पहुंचाती। लिहाजा मुझे विज्ञापन करना पड़ा। लेकिन मैं हिचकिचा रहा था और वह जज्बाती बातें कहना मुझे बहुत अटपटा लगा। इस विज्ञापन के सामने आने के बाद दर्शकों की इतनी जबरदस्त प्रतिक्रिया के लिए मैं तैयार नहीं था। जब यह टीवी पर आया तो संदेशों और चिट्ठियों की बाढ़ आ गई। पूरे देश में गांगुली वर्सेज चैपल की बहस होने लगी।
मेरे पक्ष में माहौल इसलिए भी बनने लगा, क्योंकि भारत दक्षिण अफ्रीका से हार गया था। वनडे सीरीज में टीम को 1-4 से शिकस्त मिली थी। इस प्रदर्शन की संसद में भी चर्चा हुई। यहां तक कि कई हजार किलोमीटर दूर रहते हुए भी कोच संसद सदस्यों से भिड़ते रहे। अब दक्षिण अफ्रीका के खिलाफ टीम चुनी जानी थी और मेरे नाम की चर्चा होने लगी थी। हमने कुछ ही दिन पहले पंजाब को एक मैच में हराया था। बावजूद इसके मैं जीत का जश्न मनाने में हिचक रहा था। मैंने सोचा, अगर मुझे फिर से नजरअंदाज कर दिया गया, तो शायद अब सब खत्म ही हो गया। उस दिन कोई मैच नहीं था, बावजूद इसके इडेन गार्डन्स के लॉन में मीडिया का जमावड़ा था। दोपहर बाद किसी वक्त कुछ पत्रकार चीखे, सौरव, तुम्हें चुन लिया गया है। मैंने कुछ अविश्वास और कुछ उत्साह से भरी प्रतिक्रिया देते हुए आधा हाथ उठा दिया।
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8 वर्ष पहले
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