करीब चार दशक के संसदीय जीवन में प्रणब मुखर्जी ने तीन प्रधानमंत्रियों इंदिरा गांधी, पीवी नरसिंह राव और मनमोहन सिंह के अधीन वित्त, विदेश और रक्षा जैसे महत्वपूर्ण मंत्रालयों के मंत्री के रूप में काम किया। वह इंदिरा गांधी के बेहद करीबी लोगों में से थे, तो राजीव गांधी ने उनसे एक दूरी बनाए रखी।
राजीव की मौत के बाद जब कांग्रेस संक्रमण के दौर से गुजर रही थी, तब वह प्रधानमंत्री नरसिंह राव और कांग्रेस अध्यक्ष सीताराम केसरी के भी काफी करीब थे। कांग्रेस की कमान सोनिया गांधी के हाथों में आने के बाद प्रणब मुखर्जी वरिष्ठता के नाते महत्वपूर्ण होने के साथ ही कांग्रेस और सरकार के अपरिहार्य स्तंभ थे।
कांग्रेस और देश की सत्ता राजनीति को करीब से देखने वाले 'प्रणब जी' को सोनिया गांधी ने प्रधानमंत्री क्यों नहीं बनाया? कभी आधिकारिक तौर पर प्रणब के अधीन रहे मनमोहन सिंह को सोनिया ने क्यों तरजीह दी और मनमोहन के अपने नंबर दो मंत्री से संबंध कैसे थे? ये कुछ ऐसे सवाल हैं, जिनका जवाब कदाचित प्रणब मुखर्जी से बेहतर कोई और नहीं दे सकता था।
पूर्व राष्ट्रपति की ये किताब ‘द कोलिशन ईयर्स’ संसदीय जीवन पर लिखी गई उनकी तिकड़ी की अंतिम कड़ी है। इससे पहले उन्होंने ‘द इंदिरा गांधी ईयर्स (1969-1980)’ और ‘द टरबुलेंट ईयर्स (1980-1996)’ लिखी है। जैसा कि नाम से स्पष्ट है कि यह 1996 से 2012 के बीच की गठबंधन की राजनीति के दौर के प्रत्यदर्शी की हैसियत से लिखी गई किताब है।
वह सिर्फ राजनीतिक घटनाक्रम के गवाह भर नहीं थे, बल्कि सरकार के भीतर और बाहर क्या कुछ हो रहा था, उसका हिस्सा भी थे। इसमें संसद के भीतर के कुछ ऐसे घटनाक्रम का भी जिक्र है, जिनसे विभिन्न नेताओं के आपसी संबंधों और संसदीय परंपरा का पता चलता है। एक वाक्या अटल बिहारी वाजपेयी से जुड़ा है। घटना 1977 की है।
आपातकाल के बाद जनता सरकार बन चुकी थी। शाह कमीशन के समक्ष पेश होने के बाद मुखर्जी जब संसद पहुंचे, तो राजनारायण ने उनसे कहा, 'डर से भाग गए?' इस पर वहां मौजूद वाजपेयी ने मुखर्जी का बचाव करते हुए कहा, 'क्यों डर से भागेंगे? ये अपने बाप के बेटे हैं?' वाजपेयी के बारे में उनका यह भी कहना है कि वह राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता को व्यक्तिगत स्तर पर नहीं लेते। कांग्रेस की अंदरूनी राजनीति को समझने के लिए यह एक अच्छी किताब है।
इसके मुताबिक सोनिया गांधी के विदेशी मूल का विरोध करने के पीछे शरद पवार की राजनीतिक महत्वाकांक्षा भी थी। दरअसल, पवार खुद को कांग्रेस के भीतर प्रधानमंत्री पद के दावेदार की तरह देख रहे थे। खुद मुखर्जी ने स्वीकार किया है कि कम से कम दो मौकों पर उन्हें लगा कि सोनिया उनका नाम आगे कर सकती हैं।
पहला मौका था, 2004 के आम चुनाव के बाद जब सोनिया ने अंतरात्मा की आवाज पर प्रधानमंत्री बनने से इंकार कर दिया और फिर मनमोहन सिंह का नाम आगे किया। दूसरा मौका आया 2012 में राष्ट्रपति चुनाव के समय। तब अनेक लोगों के साथ मुखर्जी को भी लगा था कि सोनिया मनमोहन सिंह को राष्ट्रपति पद के लिए आगे कर प्रधानमंत्री के रूप में उनके नाम को मंजूरी दे सकती हैं। पूर्व राष्ट्रपति की यह किताब उस दौर का एक प्रामाणिक दस्तावेज है, जब देश ने तीन गठबंधनों और उनकी सरकारों को बनते-बिगड़ते देखा। ये गठबंधन हैं, तीसरा मोर्चा, संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (यूपीए) और राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए)।
8 वर्ष पहले
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