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'आसमान छूने में'  के बहाने सच से साक्षात्कार कराते पंकज

'आसमान छूने में'  के बहाने सच से साक्षात्कार कराते पंकज।
                
                                                         
                            'आसमान छूने में' पंकज राहिब का नया कविता संग्रह है। पंकज इससे पहले राष्ट्रीय चेतना के ज्वलंत विषयों पर सतत लेखन कर्म करते रहे हैं। विदेश नीति, श्रम, स्वच्छता, महिला आबादी, जीएसटी और स्वास्थ्य जैसे सार्वजनिक महत्व वाले विषयों पर उनकी पुस्तकें पूर्व में प्रकाशित हो चुकी हैं। अब उन्होंने अपने मन की बातों को पद्यात्मक शैली में कहने का निर्णय किया है। 'आसमान छूने में' के माध्यम से यह निर्णय मूर्त रूप में प्रस्तुत हुआ है।
                                                                 
                            

स्वयं पंकज राहिब भी मानते हैं कि कविता बड़ी प्यारी चीज होती है। बड़ी आसानी से गहरी बात कर देने का प्रभावी माध्यम होती है। कविता ही वह भूमि है, जिसमें सदियों से मानवीय विचारों की फसल अपना मौलिक स्वरूप प्राप्त करती रही है। इसी भूमि से न जाने कितनी बार ज्ञान, दर्शनबोध, मोक्ष, निर्वाण,पांडित्य, क्रांति और सामाजिक राजनैतिक सुधारों की कोंपलें फूटी हैं। जैसे-

मनस और हृदय हो निर्मल
तब जीवन में आवैं कुछ फल
जीवन होता जाए सरल
मिट जाए सब इसका गरल।
 

इस कविता संग्रह में छोटी-बड़ी कुल 47 कविताएं हैं। कुछ विचारोत्तेजक हैं तो कुछ सुझावात्मक। कुछ आपबीती हैं तो कुछ जगबीती। कुछ भौतिक हैं तो कुछ आध्यात्मिक। कवि का आध्यात्मिक पक्ष कई कविताओं में उभर कर सामने आया है। एक उदाहरण देखिए -

मेरे प्रभु
मेरा ही मन
बाधक मेरे उत्थान में
मेरा ही मन
बाधक मेरे निर्वाण में
मेरा ही कर्म
धकेले मुझे अंधकार में
मेरा ही मर्म
खीचें मुझे संसार में।

आजकल के आध्यात्मिक गुरुओं का  व्यावसायीकरण हो गया है। इन गुरुओं की आए दिन किसी न किसी स्कैण्डल में फँसने की खबरें आती ही रहती हैं। इसी पर ध्यान केन्द्रित करते हुए पंकज ने लिखा है-
 
सद्गुरु
अब बहुत अधिक
 व्यस्त हो चले हैं।
अब उनसे
 मिलना आसान नहीं
 रह गया है। 
उनसे
मुलाकात के लिये
महीनों पहले
अप्वाइटमेंट
लेना पड़ता है।
खुद
सद्गुरु भी
कभी कभी
व्यथा व्यक्त करते हैं।
उन्हें अब
योग-साधना, अध्ययन
चिन्तन-मनन का
समय नहीं मिलता।
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6 वर्ष पहले

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